हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब | हिंदी शायरी

नमस्कार दोस्तों! आज मैं फिर से आपके सामने हिंदी शायरी (Hindi Poetry) हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है लेकर आया हूँ और इस कविता को मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) जी ने लिखा है.

आशा करता हूँ कि आपलोगों को यह कविता पसंद आएगी. अगर आपको और हिंदी शायरीयेँ पढने का मन है तो आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं (यहाँ क्लिक करें).

हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है - मिर्ज़ा ग़ालिब - हिंदी शायरी

हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है – मिर्ज़ा ग़ालिब – हिंदी शायरी

हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुमहीं कहो कि ये अन्दाज़े-गुफ़तगू क्या है

न शोले में ये करिशमा न बरक में ये अदा
कोई बतायो कि वो शोखे-तुन्द-ख़ू क्या है

ये रशक है कि वो होता है हमसुख़न तुमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ीए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जैब को अब हाजते-रफ़ू क्या है

जला है जिसम जहां, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुसतजू क्या है

रग़ों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहशत अज़ीज़
सिवाये वादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुशक बू क्या है

पीयूं शराब अगर ख़ुम भी देख लूं दो-चार
ये शीशा-ओ-कदह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताकते-गुफ़तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहये कि आरज़ू क्या है

हुआ है शह का मुसाहब फिरे है इतराता
वगरना शहर में ‘ग़ालिब’ की आबरू क्या है

Conclusion

तो उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारा यह हिंदी शायरी हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है अच्छा लगा होगा जिसे मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) जी ने लिखा है. आप इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हमें आप Facebook Page, Linkedin, Instagram, और Twitter पर follow कर सकते हैं जहाँ से आपको नए पोस्ट के बारे में पता सबसे पहले चलेगा. हमारे साथ बने रहने के लिए आपका धन्यावाद. जय हिन्द.

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