Food: From Collection To Production History In Hindi

(भोजन : संग्रह से उत्पादन तक -Food: From Collection To Production History In Hindi Language)
(भोजन : संग्रह से उत्पादन तक -Food: From Collection To Production History In Hindi Language)

नमस्कार दोस्तों! कैसे है आप सभी? आज मैं आपके सामने एक और नया इतिहास से समबन्धित एक कहानी लेकर आया हूँ। इस कहानी को पढने से पहले इससे पहले का एक पोस्ट जरुर पढ़े जो है In Search Of Early Humans जिससे आपको ये कहानी पढने में और भी मजा आएगा और नया-नया कुछ सिखने और जानने को मिलेगा।

हर बार की तरह फिर से कहूँगा कि अगर आपको कोई सुझाव या कुछ भी कहना हो तो आपका स्वागत है। इसके लिए आप सबसे निचे जाकर comment बॉक्स में लिख सकते हैं या तो आप मुझे social site पर भी बता सकते हैं जिसका लिंक भी आपको निचे में मिल जाएगा।

तो शुरू करते हैं आज का टॉपिक जो की है – भोजन : संग्रह से उत्पादन तक (Food: From Collection To Production) History In Hindi Language

आज जो खाना हमें खाने को मिलता है वो भोजन उगाई गई फसल और पाले गए जानवरों से ही मिलता है।

विभिन्न प्रकार के फसलों को उगाने के लिए विभिन्न प्रकार के जलवायु की आवश्यकता पड़ती है, जैसे अगर हम धान की खेती करते हैं तो इसमें गेहूं या जौ के मुकाबले ज्यादा पानी की आवश्यकता पड़ती है। 

इसलिए हम लोग हमेशा देखते हैं कि किसान विभिन्न प्रकार के फसल विशेष इलाकों में ही लगाते हैं। सिर्फ़ फसल ही नहीं अलग-अलग प्रजातियों के पशुओं को भी उनके वातावरण के अनुकूल ही पालते है। 

हम उदाहरण से समझते हैं, जैसा कि हमलोग देख सकते हैं, सूखी और पहाड़ी जैसी जलवायु के मवेशियों के मुकाबले में भेड़ या बकरी अधिक आसानी से जीवित रहते हैं।

खेती और पशुपालन की शुरुआत
(Start Of Farming And Animal Husbandry)

पिछले Post (In Search Of Early Humans) में आपने पढ़ा होगा कि दुनिया की जलवायु हमेशा ही बहुत तेजी से बदलती रही है। साथ ही साथ लोग जिन चीजों का भोजन के रूप में उपयोग करते थे, वे भी हमेशा से बदलते बदलते आ रहे हैं।

(भोजन : संग्रह से उत्पादन तक -Food: From Collection To Production History In Hindi Language)वक़्त के साथ मनुष्यों का ध्यान कुछ चीजों की ओर गया है जैसे कि खाने योग्य वनस्पतियां उन्हें कहाँ-कहाँ से मिल सकती हैं, कैसे बीज डंठल से टूटकर नीचे गिरते हैं, उन सभी गिरे बीजों का अंकुरण कैसे किया जाये और उनके पौधों को कैसे निकला जाए और भी कई तरह की बातें मनुष्यों ने सोचा।

इसी तरह उन्होंने धीरे-धीरे पेड़-पौधों की देखभाल करना शुरू कर दिया। उन्हींने अपने पेड़-पौधों को चिड़ियों और जानवरों से कैसे बचाया होगा, ताकि पेड़-पौधे अच्छी तरह से बढ़ सकें और उनके बीज बहुत ही अच्छी तरह से पक सकें। इसी प्रकार मनुष्य धीरे-धीरे किसान बन गए होंगे और कृषि की ओर ध्यान दिया होगा।

इसी तरह मनुष्यों ने अपने-अपने घरों के आस-पास जानवरों के लिए चारा रखा होगा जिससे मोहित होकर जानवर उनके पास आये होंगे और मनुष्यों ने उन्हें पालतू बना लिया होगा। 

जानवरों में एक कुत्ता ही था जिसको सबसे पहले पालतू बनाया गया था, क्योंकि कुत्ते वफादार होते हैं और कुत्तों को आसानी से पालतू बनाया जा सकता है।

इसके बाद मनुष्य धीरे-धीरे लोग भेड़, बकरी, गाय और सूअर जैसे कई तरह-तरह के जानवरों को अपने घरों के नजदीक आने के लिए उत्साहित करने लगे होंगे।

इस तरह के जानवर हमेशा एक साथ झुंड में रहते थे और वो अधिकतर घास को ही खाते थे। अक्सर मनुष्य दूसरे जंगली जानवरों के आक्रमण से पालतू जानवरों की सुरक्षा किया करते थे और इस प्रकार मनुष्य धीरे-धीरे पशुपालक भी बन गए होंगे।

मनुष्यों द्वारा पेड़-पौधे उगाने और जानवरों की पालने या देखभाल करने प्रक्रिया को ही ‘बसने की प्रक्रियाका नाम दिया गया है। मनुष्यों द्वारा अपनाए गए ये पेड़-पौधे तथा पालतू जानवर अक्सर जंगल के पेड़-पौधे और जानवरों के अलग होते हैं।

इसकी सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य जब बस रहे थे तो उस बसने की प्रक्रिया में अपनाए गए पेड़-पौधों या जानवरों का लोग अपने मुताबिक़ चयन करते हैं। 

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हम एक उदाहरण को लेकर चलते हैं कि मनुष्य उन्हीं पेड़-पौधों और जानवरों को चुनते हैं जिन जानवरों के बीमार होने की संभावना बहुत ही कम हो। यही नहीं, मनुष्य उसी प्रकार के पेड़-पौधों को चुनते हैं जिनसे बड़े और अच्छे दाने वाले अनाज उत्तपन्न होते हैं।

और साथ ही साथ जिनकी मजबूत डंठले अनाज के पकने के बाद उनके दानों के भार को अच्छे से संभाल सकें। इस तरह के पेड़-पौधों के बीजों को अच्छी तरह से संभालकर रखा जाता है ताकि फिर से इस तरह के पेड़-पौधे को उगाने के लिए उनके गुण अच्छी तरह से सुरक्षित रह सकें।

इसी तरह उन्हीं जानवरों को आगे प्रजनन के लिए चुना जाता है, जो अहिंसक होते हैं। इसलिए हमलोग देखपाते हैं कि पाले गए पशु तथा खेती के लिए अपनाए गए पेड़-पौधे, जंगली जानवरों और पेड़-पौधों से धीरे-धीरे अलग-अलग होते गए।

हमलोग आमतौर पर देख पाते हैं कि जंगली जानवरों की तुलना में मनुष्य द्वारा पाले गए जानवरों के दाँत और सींग अधिकांश छोटे ही होते हैं।

मनुष्यों के बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे-धीरे चलती रही है। यह लगभग 12,000 सालों पहले ही शुरू हुई है। वास्तव में देखा जाए तो हम आज जो भी भोजन करते हैं वो इसी बसने की प्रक्रिया की वजह से ही है। 

मनुष्यों द्वारा कृषि के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फ़सलों में से गेहूँ तथा जौ हैं, जिसका प्रमाण हमें कई जगहों पर मिल है। इसी तरह से सबसे पहले पालतू बनाए गए जानवरों में कुत्ते के बाद भेड़-बकरियाँ ही आते हैं।

एक नवीन जीवन-शैली
(A New Lifestyle)

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आपलोगों ने बहुत पेड़-पौधे लगाये होंगे, तो आपने देखा होगा कि पेड़-पौधे को विकसित होने में कुछ समय लगता है। इसे विकसित होने में कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ सालों तक लग जाते है। 

इसलिए जब मनुष्य पेड़-पौधे उगाने लगे तो इन पेड़-पौधों की देखभाल के लिए उन्हें एक ही जगह पर बहुत लंबे समय तक रहना पड़ा था। बीज बोने से लेकर फसलों के पकने तक के लिए, पौधों की सिंचाई करने के लिए, खरपतवारों को हटाने के लिए, जानवरों और चिड़ियों से इनको बचने के लिए, जैसे इसमें बहुत-से काम शामिल हुआ करते थे। 

फसल की कटाई करने के बाद, उन अनाजों का उपयोग बहुत ही संभाल कर करना पड़ता था। मनुष्यों के लिए अनाज को भोजन और बीज, दोनों ही रूपों में बचा कर रखना बहुत ही आवश्यक था, इसलिए लोगों ने अनाजों को रखना शुरू किया जिसे आज हम भंडारण कहते हैं।

बहुत-से इलाकों में मनुष्यों ने मिट्ट के बड़े-बड़े बर्तन बनाए, टोकरियाँ बुनीं या फिर जमीन में गड्ढा खोदा। क्या आपलोगों को लगता है कि शिकारी या भोजन-संग्रह करने वाले बर्तन बनाते बनाते होंगे और उनका इस्तेमाल भी करते होंगे? आप अपना जवाब comment बॉक्स में बताओ।

जानवर : चलते-फिरते खाद्य-भंडार
(Animals: ‘Food Stores’ On The Go)

(भोजन : संग्रह से उत्पादन तक -Food: From Collection To Production History In Hindi Language)जैसा कि आपलोग जानते हैं कि जानवर बच्चे देते हैं जिससे उन जानवरों की संख्या बढ़ती है। अगर मनुष्य जानवरों की देखभाल करे उन्हें पाले तो  उनकी संख्या में वृद्धि होती है, लेकिन हमें उन जानवरों से दूध भी मिल सकता है जो मनुष्य के भोजन का एक बहुत ही अच्छा स्रोत है। 

यही नहीं इस पालतू जानवरों से मनुष्य को मांस भी मिलता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पशुपालन, भोजन के भंडारण‘ करने का एक बहुत ही अच्छा तरीका है। 

आओ, आरंभिक कृषकों और पशुपालकों के बारे में पता करें?
(Come, Find Out About The Early Farmers And Livestock Farmers?)

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आपलोग ऊपर मानचित्र (Map) में देखें। क्या आपको वहाँ कई नीले वर्ग दिख रहे हैं? क्या आपलोगों को पता है, इनमें से प्रत्येक बिंदु उस स्थान (Place) को दिखता है, जहाँ-जहाँ पर पुरातत्वविदों को शुरुआती किसानों और जानवर पालने वालों के होने के साक्ष्य मिले हैं।

ये पूरे उपमहाद्वीप (Subcontinent) में पाए गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पश्चिमोत्तर क्षेत्र (Northwest region) में, आधुनिक कश्मीर में, और पूर्वी तथा दक्षिण भारत (East and South India) में पाए गए हैं।

वास्तव में ये चिन्ह (Mark) लगाया हुआ जगह कृषकों और पशुपालकों (Farmers and Livestock) की बस्तियाँ थीं या नहीं, वैज्ञानिक ने इसका पता लगाने के लिए खुदाई में मिले पेड़-पौधों और वहाँ मिले जानवरों के अस्थियों के नमूनों का अध्ययन (study) करते हैं।

इनमें से सबसे रोचक जले हुए अनाज के दानों के अवशेष हैं। ऐसा लगता है कि ये गलती से या फिर जानबूझकर जलाए गए होंगे। वैज्ञानिक इन अनाज के दानों की पहचान कर सकते हैं। इस तरह हमें पता चलता है कि इस उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में बहुत सारी फसलें उगाई जाती रही होंगी। वैज्ञानिक विभिन्न जानवरों की हड्डियों की भी पहचान कर सकते हैं।

नीचे की तालिका से तुम यह जान सकती हो कि कहाँ-कहाँ अनाजों और पालतू जानवरों की हड्डियों के अवशेष मिले हैं।

Food: From Collection To Production History In Hindi Language)

स्थायी जीवन की ओर
(Towards Sustainable Life)

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पुरातत्वविदों (Archaeologists) को कुछ पुरास्थलों पर झोपड़ियों और घरों के निशान मिले हैं। जैसे कि बुर्ज़होम (Burzholm),वर्तमान कश्मीर, के लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे जिन्हें गर्तवास (Detention) कहा जाता है।

इसमें उतरने के लिए सीढ़ियां होती थीं। इससे उन्हें ठंड के मौसम में सुरक्षा मिलती होगी। पुरातत्वविदों को झोपड़ियों के अंदर और बाहर दोनों ही जगहों पर मनुष्यों के आग जलाने के स्थान मिली हैं। वहाँ देखकर ऐसा लगता है कि मनुष्य मौसम के अनुकूल घर के अंदर या बाहर खाना पकाया करते होंगे।

शोधकर्ताओं को वहाँ से बहुत सारी पत्थर के औजारें भी मिले हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जो पुरापाषाणयुगीन उपकरणों (Palaeolithic instruments) से अलग हैं। इसलिए इन्हें नवपाषाण युग (Neolithic Age) का माना गया है। 

इन औजारों में से कई वे औज़ार भी हैं, जिनकी धार को अधिक पैना करने के लिए उन पर पॉलिश चढ़ाई जाती थी। ओखली और मूसल (Mortar and pestle) का इस्तेमाल अनाज और वनस्पतियों से प्राप्त अन्य बहुत सारी चीज़ों को पीसने (grind) के लिए किया जाता था। 

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आज हज़ारों सालों के बाद भी ओखली और मूसल (Mortar and pestle) का इस्तेमाल अनाज को पीसने के लिए किया जाता है। इसी तरह प्राचीन प्रस्तरयुगीन औज़ारों (Medieval tools) का निर्माण और इसका इस्तेमाल लगातार होता रहा है। यहाँ तक की कुछ औजारों का निर्माण हड्डियों से भी किया जाता था।

नवपाषाण युग (Neolithic Age) के पुरास्थलों से बहुत तरह के मिट्टी के बर्तन मिले हैं जो एक-दुसरे से बहुत अलग थे। कभी-कभी इन पर अलंकरण (Ornamentation) भी किया जाता था। 

उस बर्तनों का इस्तेमाल चीजों को अच्छी तरह से सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। मनुष्य धीरे-धीरे बर्तनों का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए भी करने लगे। चावल, गेहूँ तथा दलहन जैसे कई तरह के अनाज आज के समय के आहार का महत्वपूर्ण अंग बन गए थे। 

इसके साथ-साथ ही अब मनुष्य कपड़े भी बुनने लगे थे। इसके लिए मनुष्य को कपास जैसे आवश्यक पौधे भी उगाने लगे  थे।

आपको क्या लगता है, क्या ये बदलाव हर जगह एक साथ ही हो गए होंगे? ऐसा बिलकुल भी नहीं है। जहाँ एक तरफ़ कई स्थानों पर स्त्री-पुरुष शिकार करते थे और भोजन-संग्रह करने का काम भी करते रहे थे, वहीं अन्य मनुष्यों ने हज़ारों सालों के दरमियान धीरे-धीरे खेती को अपनाया और पशुपालन को अपना लिया।

बहुत जगहों पर मनुष्य मौसम के हिसाब से अपने आप को बदल-बदल कर अपनी जीविका चलाया करते थे।

अन्य रीति-रिवाज
(Other Customs)

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पुरातत्त्वविद् (Archaeologist) बहुत स्पष्ट रूप से इस बारे में नहीं कह सकते। विद्वानों ने ऐसे किसानों का अध्ययन किया है। इनमें प्रायः कृषक (Cultivator) और पशुपालक (animal keeper) समूह में रहते हैं जिन्हें जनजाति (Tribe) कहते हैं। विद्वानों ने पाया है कि ये लोग कुछ ऐसे रीति-रिवाजों (Customs) को मानते हैं, जो संभवतः पहले से ही प्रचलित रहे हैं।

जनजाति (The Tribe)

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प्रायः जनजाति (Tribe) के लोग छोटी-छोटी बस्तियों में रहते हैं। इनलोगों के ज्यादातर परिवार एक-दूसरे से संबंधित (Related) होते हैं और परिवारों के समूह एक मिलाकर जनजाति (tribe) का निर्माण करते हैं।

  • जनजातियों के सदस्य शिकार करने, भोजन-संग्रह करने, खेती करने, पशुपालन करने और मछली पकड़ने जैसे पेशों को ही अपनाते हैं। महिलाएँ अक्सर खेती का सम्पूर्ण कार्य किया करती हैं।
  • इसमें ज़मीन तैयार करके बीजों को बोने, पेड़-पौधे की देख-रेख करने से लेकर फसलों के काटने तक का सारा कार्य शामिल है। बच्चे पेड़-पौधों की देख-रेख किया करते हैं और चिड़ियों तथा जानवरों को मारकर दूर भगाते हैं ताकि वे पेड़-पौधों और फ़सलों को कोई नुकसान न पहुँचाए।
  • महिलाएँ फ़सल दावकर अनाज कटती-पीसती हैं। परुष आमतौर पर पशओं के बडे-बडे झण्डों को चराते हैं जबकि बच्चे छोटे झुण्डों को। यहाँ तक कि जानवरों की साफ़-सफ़ाई तथा दूध निकालने का सारा कार्य भी स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर करते हैं।
  • इसी तरह दोनों साथ मिलकर बर्तन बनाने का काम, टोकरियाँ बनाने का काम, औज़ार तथा झोपड़ियाँ बनाने का काम भी दोनों स्त्री और पुरूष साथ-साथ मिलकर ही करते हैं। प्रायः जनजातियों का नाच-गाण और घरों को सजाना भी इनकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है।

  • इन जनजातियों में कई व्यक्तियों को नेता माना जाता है। वे नेता बहुत अनुभवी वृद्ध व्यक्ति, नौजवान योद्धा या फिर उनका पुरोहित हो सकते हैं। जनजातियों में वयस्क महिलाओं को भी उनके ज्ञान तथा अनुभव के लिए एक अलग ही सम्मान दिया जाता है।

  • जनजातियों की सांस्कृतिक-परम्पराएँ बहुत समृद्ध तथा विशिष्ट होती हैं। इनमें उनकी भाषाएँ, संगीत, कहानियाँ तथा चित्रकारी भी शामिल हैं। उनके अपने देवी-देवता होते हैं।
  • ज़मीन, जंगल, घास के मैदान तथा पानी पूरे कुनबे की सम्पत्ति मानी जाती है जिनका उपयोग सभी एक साथ करते हैं। इनमें गरीब और अमीर के बीच कोई ख़ास अंतर नहीं होता। इसलिए जनजातीय समाज अन्य समाजों से भिन्न होते हैं। 

इस पोस्ट को अच्छे से समझने के लिए इसके पहले का पोस्ट (In Search Of Early Humans) पढना चाहिए, जिससे आपको ये पोस्ट समझ्ने में आसानी होगी।

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-धन्यवाद 

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