In Search Of Early Humans | History In Hindi Story | 7 Moral New 2020

In Search Of Early Humans | History In Hindi Story | 7 Moral
In Search Of Early Humans (History In Hindi Story)

आरंभिक मानव : आखिर वे इधर-उधर क्यों घूमते थे?
(Early Man: Why Did They Roam Around?)

हम उन लोगों के बारे में जानते हैं, जो इस उपमहाद्वीप में बीस लाख साल पहले रहा करते थे। आज हम उन्हें आखेटक-खाद्य संग्राहक के नाम से जानते हैं। भोजन का इंतज़ाम करने की विधि के आधार पर उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है। 

आमतौर पर खाने के लिए वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे, मछलियाँ और चिड़िया पकड़ते थे, फल-मूल, दाने, पौधे-पत्तियाँ, अंडे इकट्ठा किया करते थे। हमारे उपमहाद्वीप जैसे गर्म देशों में पेड़-पौधों की अनगिनत प्रजातियाँ मिलती हैं। इसीलिए पेड़-पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ भोजन के अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत थे।

लेकिन यह सब कर पाना बिल्कुल आसान नहीं था। ऐसे कई जानवर हैं, जो हमसे ज़्यादा तेज़ भाग सकते हैं और बहुत-से जानवर हम से ज़्यादा ताकतवर भी होते हैं। जानवरों के शिकार, चिड़िया या मछलियाँ पकड़ने के लिए बड़ा सतर्क, जागरूक और तेज़ होना पड़ता है। 

पेड़-पौधों से खाना जुटाने के लिए यह जानना जरूरी होता है, कि कौन-से पेड़-पौधे खाने योग्य होते हैं, क्योंकि कई तरह के पौधे विषैले भी होते हैं। साथ ही फलों के पकने के समय की जानकारी भी ज़रूरी होती है।

आखेटक-खाद्य संग्राहक समुदाय के लोगों के एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहने के पीछे कम से कम चार कारण हो सकते हैं।

पहला कारण यह कि अगर वे एक ही जगह पर ज़्यादा दिनों तक रहते तो आस-पास के पौधों, फलों और जानवरों को खाकर समाप्त कर देते थे। इसलिए और भोजन की तलाश में इन्हें दूसरी जगहों पर जाना पड़ता था।

दूसरा कारण यह कि जानवर अपने शिकार के लिए या फिर हिरण और मवेशी अपना चारा ढूँढ़ने के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाया करते हैं। इसीलिए, इन जानवरों का शिकार करने वाले लोग भी इनके पीछे-पीछे जाया करते होंगे।

तीसरा कारण यह कि पेड़ों और पौधों में फल-फूल अलग-अलग मौसम में आते हैं, इसीलिए लोग उनकी तलाश में उपयुक्त मौसम के अनुसार अन्य इलाकों में घूमते होंगे। 

और चौथा कारण यह है कि पानी के बिना किसी भी प्राणी या पेड़-पौधे का जीवित रहना संभव नहीं होता और पानी झीलों, झरनों तथा नदियों में ही मिलता है। यद्यपि कई नदियों और झीलों का पानी कभी नहीं सूखता, कुछ झीलों और नदियों में पानी बारिश के बाद ही मिल पाता है। 

इसीलिए ऐसी झीलों और नदियों के किनारे बसे लोगों को सूखे मौसम में पानी की तलाश में इधर-उधर जाना पड़ता होगा। इसके अलावा लोग अपने नाते-रिश्तेदारों या मित्रों से मिलने भी जाया करते होंगे। यहाँ यह स्मरण रखना ज़रूरी है, कि ये सभी लोग पैदल यात्रा किया करते थे।

आरंभिक मानव के बारे में जानकारी कैसे मिलती है?
(How Do I Get Information About Early Humans?)

पुरातत्त्वविदों को कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनका निर्माण और उपयोग आखेटक-खाद्य संग्राहक किया करते थे। यह संभव है कि लोगों ने अपने काम के लिए पत्थरों, लकड़ियों और हड्डियों के औज़ार बनाए हों। इनमें से । पत्थरों के औज़ार आज भी बचे हैं।

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इनमें से कुछ औज़ारों का उपयोग फल-फूल काटने, हड्डियाँ और मांस काटने तथा पेड़ों की छाल और जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था। कुछ के साथ हड्डियों या लकड़ियों के मुढे लगा कर भाले और बाण जैसे हथियार बनाए जाते थे। कुछ औज़ारों से लकड़ियाँ काटी जाती थीं। लकड़ियों का उपयोग ईंधन के साथ-साथ झोपड़ियाँ और औजार बनाने के लिए भी किया जाता था।

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रहने की जगह निर्धारित करना
(
Determine Where To Stay)

नीचे मानचित्र में लाल त्रिकोण वाले स्थान वे पुरास्थल हैं जहाँ पर आखेटक-खाद्य संग्राहकों के होने के प्रमाण मिले हैं। इनके अलावा भी और कई स्थानों पर आखेटक-खाद्य संग्राहक रहते थे। मानचित्र में सिर्फ कुछ गिने-चुने स्थान ही चिह्नित किए गए हैं। कई पुरास्थल नदियों और झीलों के किनारे पाए गए हैं।

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चूंकि पत्थर के उपकरण बहुत महत्वपूर्ण थे इसलिए लोग ऐसी जगह ढूँढ़ते रहते थे, जहाँ अच्छे पत्थर मिल सकें। जहाँ लोग पत्थरों से औज़ार बनाते थे, उन स्थलों को उद्योग-स्थल कहते हैं।

हमें इन उद्योग-स्थलों के बारे में जानकारी कैसे मिलती है? आमतौर पर हमें ऐसी जगहों पर पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े मिलते हैं, और ऐसे उपकरण मिलते हैं, जिन्हें लोग इन स्थलों पर छोड़ गए होंगे क्योंकि वे ठीक नहीं बने होंगे। 

साथ ही औजार बनाने के बाद पत्थरों के टूटे-फूटे टुकड़े भी इन स्थलों पर मिलते हैं। कभी-कभी लोग इन स्थलों पर कुछ ज़्यादा समय तक रहा करते थे। ऐसे स्थलों को आवासीय और उद्योग-स्थल कहते हैं। 

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पुरास्थल (Arche Site)

पुरास्थल उस स्थान को कहते हैं जहाँ औज़ार, बर्तन और इमारतों जैसी वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं। ऐसी वस्तुओं का निर्माण लोगों ने अपने काम के लिए किया था और बाद में वे उन्हें वहीं छोड़ गए। ये ज़मीन के ऊपर, अन्दर, कभी-कभी समुद्र और नदी के तल में भी पाए जाते हैं। इन पुरास्थलों के बारे में आपको अगले भाग  में बताया जाएगा।

पाषाण औज़ारों का निर्माण
(Construction Of Stone Tools)

पाषाण उपकरणों को प्रायः दो तरीकों से बनाया जाता था। 

  1. पत्थर से पत्थर को टकराना। यानी जिस पत्थर से कोई औज़ार बनाना होता था, उसे एक हाथ में लिया जाता था, और दूसरे हाथ से एक पत्थर का हथौड़ी जैसा इस्तेमाल होता था। इस तरह आघात करने वाले पत्थर से दूसरे पत्थर पर तब तक शल्क निकाले जाते हैं जब तक वांछित आकार वाला उपकरण न बन जाए।
  2. दूसरे तरीके को दबाव शल्क-तकनीककहा जाता है। इसमें क्रोड को एक स्थिर सतह पर टिकाया जाता है और इस क्रोड पर हड्डी या पत्थर रखकर उस पर हथौड़ीनुमा पत्थर से शल्क निकाले जाते हैं जिससे वांछित उपकरण बनाए जाते हैं।

आग की खोज
(
Search Of Fire)

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कुरनूल गुफा, यहाँ राख के अवशेष मिले हैं। इसका मतलब यह है कि आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे। आग का इस्तेमाल कई कार्यों के लिए किया गया होगा जैसे कि प्रकाश के लिए, मांस भूनने के लिए और खतरनाक जानवरों को दूर आदि भगाने के लिए। 

बदलती जलवायु
(
Changing Climate)

लगभग 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में बड़े बदलाव आए और गर्मी बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान बनने लगे। इससे हिरण, बारहसिंघा, भेड़, बकरी और गाय जैसे उन जानवरों की संख्या बढ़ी, जो घास खाकर जिन्दा रह सकते हैं।

जो लोग इन जानवरों का शिकार करते थे, वे भी इनके पीछे आए और इनके खाने-पीने की आदतों और प्रजनन के समय की जानकारी हासिल करने लगे। हो सकता है कि तब लोग इन जानवरों को पकड़ कर अपनी ज़रूरत के अनुसार पालने की बात सोचने लगे हों। साथ ही इस काल में मछली भी भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत बन गई।

इसी दौरान उपमहाद्वीप के भिन्न-भिन्न इलाकों में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे। शायद महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने इन अनाजों को भोजन के लिए बटोरना शुरू कर दिया होगा।

साथ ही वे यह भी सीखने लगे होंगे कि यह अनाज कहाँ उगते थे और कब पककर तैयार होते थे। ऐसा करते-करते लोगों ने इन अनाजों को खुद पैदा करना सीख लिया होगा। 

शैल चित्रकला : इनसे हमें क्या पता चलता है?
(Shell Painting: What Do We Know From Them?)

जिन गुफाओं में लोग रहते थे, उनमें से कुछ की दीवारों पर चित्र मिले हैं।

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इनमें कुछ सुन्दर उदाहरण मध्य प्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश की गुफाओं से मिले चित्र हैं। इनमें जंगली जानवरों का बड़ी कुशलता से सजीव चित्रण किया गया है।

कौन क्या करता था?
(Who Used To Do What?)

हमने पढ़ा कि आरंभिक लोग शिकार तथा फल-मूल का संग्रह किया करते थे। वे पत्थरों के औज़ार और गुफाओं में चित्र बनाते थे। क्या हमें कोई ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिनसे पता चले कि महिलाएँ शिकार करती थीं या पुरुष औजार बनाते थे या फिर महिलाएँ चित्रकारी करती थीं और पुरुष फल-मूल इकट्ठा करते थे

वास्तव में, हमें इसका ज्ञान नहीं है। लेकिन दो बातें हो सकती हैं। महिला और पुरुष दोनों ने मिलकर कई काम एक साथ किया होगा। यह भी संभव है, कि कुछ तरह के काम केवल महिलाएँ करती थीं और कुछ केवल पुरुष। इसके अलावा उपमहाद्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परम्पराएँ भी रही होंगी।

हुँस्गी का सूक्ष्म-निरीक्षण
(Micro-Inspection Of Hunskgi)

हुँस्गी,यहाँ पर पुरापाषाण युग के कई पुरास्थल मिले थे। कुछ पुरास्थलों से अलग-अलग कार्यों में लाए जाने वाले कई प्रकार के औज़ार मिले थे। ये संभवतः आवास और उद्योग-स्थल रहे होंगे। कुछ छोटे पुरास्थलों में भी औज़ारों के बनाए जाने के प्रमाण मिले हैं। इनमें से कुछ पुरास्थल झरनों के निकट थे। अधिकांश औज़ार चूना पत्थरों से बनाए जाते थे।

अन्यत्र (Elsewhere)

यह चित्र फ्रांस की एक गुफा का है। इस पुरास्थल की खोज लगभग 100 साल पहले चार स्कूली छात्रों ने की थी। इस तरह के चित्र लगभग 20,000 साल पहले से लेकर 10,000 साल पहले के बीच बनाए गए होंगे। इनमें कई जानवरों के चित्र हैं। इनमें जंगली घोड़े, गाय, भैंस, गैंडा, रेनडीयर, बारहसिंघा और सूअरों को गहरे-चमकीले रंगों से चित्रित किया गया है।

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इन रंगों को लौह-अयस्क और चारकोल जैसे खनिज पदार्थों से बनाया जाता था। यह संभव है कि इन चित्रों को उत्सवों के अवसर पर बनाया जाता था या फिर इन्हें शिकारियों द्वारा शिकार पर निकलने से पहले कुछ अनुष्ठानों के लिए बनाया गया होगा।


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-धन्यवाद 

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