गाँव का बाजार (Village Market)

गाँव का बाजार (Village Market)
गाँव का बाजार (Village Market) | Source: Wikimedia

गाँव का बाजार

बाजार वह स्थान है जहाँ खरीदनेवाले और बेचनेवाले मिलते हैं. छोटे अथवा बड़े शहरों में स्थायी बाजार होते हैं. हम जानते हैं कि पटना में न्यू मार्केट और पटना मार्केट इत्यादि हैं. परन्तु गाँवों में समय-समय पर बाजार लगते हैं. ये सप्ताह में दो बार अथवा एक बार लगते हैं. निश्चित तिथि को जिस गाँव में बाजार लगता है वहाँ बड़ी चहलपहल रहती हैं. निकटस्थ शहर के लोग अपना माल लेकर वहाँ जाते हैं और उसे बेचते हैं.

किसान लोग सवेरे से ही अपने सिर पर अपना माल ले जाते हुए दिखाई देते हैं. कुछ लोग तरकारी ले जाते हैं. गुड़, दाल-चावल, गेहूँ, गन्ना और लाल मिर्च भी वहाँ -बिक्री के लिए लाये जाते हैं. बाहर के व्यापारी पारचून के सामान, खिलौने, लालटेन

आदि वहाँ ले जाते हैं. मछुए लोग टोकरी में मछली ले जाते हैं और फलवाले फल. कपड़े के व्यापारी भी उस दिन अपने कार्य में व्यस्त रहते हैं.

दुकानें छायादार तथा खुली जगहों में लगती हैं. वहाँ हल्ला होता है और खरीदार लोग बोरा लेकर सामान का दाम पूछते चलते हैं. लोग एक-दूसरे को धक्का देते हैं. कुछ लोग पक्षी, जैसे, तोता और कबूतर, बेचने के लिए ले जाते हैं. बेचनेवाले ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए चिल्लाते हैं. उनकी आवाजें सुनने से कान भर जाता है. बढ़ई अपने काठ के सामान और लोहार अपने लोहे के सामान वहाँ ले जाते हैं.

बच्चों के लिए यह एक आनन्द का दिन है. वे इधर-उधर दौड़ते हैं और सीटी बजाते हैं. छोटी-छोटी लड़कियाँ और स्त्रियाँ मिठाई और फल खरीदती हुई दिखाई पड़ती हैं. घर का मुखिया भी सामान खरीदने के लिए वहाँ जाता है.

बदमाश लोग भी उस दिन अपने कार्य में व्यस्त रहते हैं. ये लोग इधर-उधर दंगा कराते फिरते हैं. कभी-कभी वे लोग जेब-कतरों को उनके कार्य में सहायता देते हैं.

इस प्रकार के बाजार बड़े उपयोगी होते हैं. ये बाजार वैसे केन्द्र हैं जहाँ अन्य गाँवों के लोग भी मिलते हैं. इन्हें समस्याओं की जानकारियाँ प्राप्त होती हैं.

Also Read: मेरा गाँव (My Village)

Village Market – Essay in English

A market is a place where buyers and sellers meet. In towns and cities, there are permanent markets. At Patna, we know of New Market, Patna Market, etc. But in villages periodical markets are held. They are held twice a week or once a week. A place is fixed, and the market is organised there. On the fixed day in the village, where the market is held, it is full of life. People from towns go there with their goods and offer them for sale.

The farmers are seen carrying their produce on their heads since early morning. Some carry vegetables. Gur, rice and pulses, wheat, sugarcane, red chillies, etc. are also carried there for sale. Merchants from towns take their goods such as toys, lanterns etc.

Fishermen carry their fish in baskets and fruit vendors go with fruits. Cloth merchants are also seen as busy on that day.

The shops are set either in temporary sheds or open places. There is a great noise and buyers with bags are seen making enquiries about the prices of goods. People push on one another and make a great noise. Some people carry birds like parrots and pigeons and offer them for sale.

The vendors raise their voices to attract customers and their continued noise deafens men’s ears. Carpenters take their wooden goods and the blacksmiths take their iron articles.

Boys have a happy time. They run about and blow whistles. Small girls and women are seen purchasing sweets and fruits. The heads of families go to purchase needles, matches, sugar and thread.

Loafers are also busy on this day. They move about creating trouble. Sometimes they help the pick-pockets in carrying on their business.

Such markets are really very useful. They are centres of trade. They are meeting grounds where men of different villages assemble and know about the problems of one another.

Conclusion

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