दान का हिसाब | Moral Hindi Story For Kids | 7 Moral

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids

नमस्कार दोस्तों ! आज मैं आपके सामने एक ऐसा हिंदी स्टोरी (Hindi Story) लेकर आया हूँ जिसे आपको पढकर कुछ अच्छा सिखने को मिलेगा । मैंने ये कहानी बहुत बार पढ़ी है तो सोचा कि क्यों  ना ये कहानी आपके सामने भी रखा जाए ।

तो एक नई उम्मीद और नई कहानी के साथ आप जुर जायें , क्यूंकि ये कहानी वास्तविक जीवन की कहानी जैसी है ।

ये कहानी एक राजा और एक साधू के बिच की है जो राजा से कुछ माँगने आता है । अब क्या मांगने आता है और क्या होता है इस कहानी में ये आपको पढकर ही पता लगेगा । (दान का हिसाब – Moral Hindi Story For Kids)

एक समय की बात है एक राजा रहता था। वो राजा लकदक कपड़े पहनकर यूँ तो हज़ारों रुपए खर्च करते रहते थे, पर दान के वक्त उनकी मुट्ठी बंद हो जाती थी।

राजसभा में एक से एक नामी लोग आते रहते थे, लेकिन गरीब, दुखी, विद्वान, सज्जन इनमें से कोई भी नहीं आता था। इसका कारण यह था कि वहाँ पर इनका बिल्कुल सत्कार नहीं होता था।

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids

एक बार उस देश में बहुत बड़ा अकाल पड़ गया। पूर्वी सीमा के लोग भूखे-प्यासे मरने लगे। तो राजा के पास खबर आई कि लोग भूखे-प्यासे मरे जा रहे हैं। तो इसपर वे राजा बोले, “यह तो भगवान की मार है, इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है।”

लोगों ने कहा, “महाराज, राजभंडार से हमारी सहायता करने की कृपा करें, जिससे हम लोग दूसरे देशों से अनाज खरीदकर अपनी जान बचा सकें।”

राजा ने कहा, “आज तुम लोग अकाल से पीड़ित हो, कल पता चलेगा, कहीं भूकंप आया है। परसों सुनूँगा, कहीं के लोग बड़े गरीब हैं, दो वक्त की

रोटी नहीं जुटती। इस तरह सभी की सहायता करते-करते जब राजभंडार खत्म हो जाएगा तब खुद मैं ही दिवालिया हो जाऊँगा।”

यह सुनकर सभी निराश होकर लौट गये।

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids

इधर अकाल का प्रकोप फैलता ही जा रहा था। न जाने रोज़ कितने ही लोग भूख से मरने लगे। लोग फिर राजा के पास पहुंचे। उन्होंने राजसभा में गुहार लगाई, “दुहाई महाराज! आपसे ज़्यादा कुछ नहीं चाहते, सिर्फ दस हज़ार रुपए हमें दे दें तो हम आधा पेट खाकर भी जिंदा रह जाएंगे।”

राजा ने कहा, “दस हज़ार रुपए भी क्या तुम्हें बहुत कम लग रहे हैं? और उतने कष्ट से जीवित रहकर लाभ ही क्या है?” 

एक व्यक्ति ने कहा, “भगवान की कृपा से लाखों रुपए राजकोष में मौजूद हैं। जैसे धन का सागर हो। उसमें से एक-आध लोटा ले लेने से महाराज का क्या नुकसान हो जाएगा?”

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
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राजा ने कहा, “राजकोष में अधिक धन है तो क्या उसे दोनों हाथों से लुटा दूँ?”

एक अन्य व्यक्ति ने कहा, “महल में प्रतिदिन हज़ारों रुपए इन सुगंधित वस्त्रों, मनोरंजन और महल की सजावट में खर्च होते हैं। यदि इन रुपयों में से ही थोड़ा-सा धन ज़रूरतमंदों को मिल जाए तो उन दुखियों की जान बच जाएगी।”

यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया। वह गुस्से से बोला, “खुद भिखारी होकर मुझे उपदेश दे रहे हो? मेरा रुपया है, मैं चाहे उसे उबालकर खाऊँ चाहे तलकर! मेरी मर्जी। तुम अगर इसी तरह बकवास करोगे तो मुश्किल में पड़ जाओगे। इसलिए इसी वक्त तुम चुपचाप खिसक जाओ।”

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
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राजा का क्रोध देखकर लोग वहाँ से चले गए।

राजा हँसते हुए बोला, “छोटे मुँह बड़ी बात! अगर सौ-दो सौ रुपए होते तो एक बार सोच भी सकता था। पहरेदारों की खुराक दो-चार दिन कम कर देता और यह रकम पूरी भी हो जाती। मगर सौ-दो सौ से इन लोगों का पेट नहीं भरेगा, एकदम दस हज़ार माँग बैठे। छोटे लोगों के कारण नाक में दम हो गया है।”

यह सुनकर वहाँ उपस्थित लोग हाँ-हूँ कह कर रह गए। मगर मन ही मन उन्होंने भी सोचा, “राजा ने यह ठीक नहीं किया। जरूरतमंदों की सहायता करना तो राजा का कर्तव्य है।” 

दो दिन बाद न जाने कहाँ से एक बूढ़ा संन्यासी राजसभा में आया। उसने राजा को आशीर्वाद देते हुए कहा, “दाता कर्ण महाराज! बड़ी दूर से आपकी प्रसिद्धि सुनकर आया हूँ। संन्यासी की इच्छा भी पूरी कर दें।” 

अपनी प्रशंसा सुनकर राजा बोला, “ज़रा पता तो चले तुम्हें क्या चाहिए? यदि थोड़ा कम माँगो तो शायद मिल भी जाए।”

संन्यासी ने कहा, “मैं तो संन्यासी हूँ। मैं अधिक धन का क्या करूँगा! मैं राजकोष से बीस दिन तक बहुत मामूली भिक्षा प्रतिदिन लेना चाहता हूँ। मेरा भिक्षा लेने का नियम इस प्रकार है, मैं पहले दिन जो लेता हूँ, दूसरे दिन उसका दुगुना, फिर तीसरे दिन उसका दुगुना, फिर चौथे दिन तीसरे दिन का दुगुना। इसी तरह से प्रतिदिन दुगुना लेता जाता हूँ। भिक्षा लेने का मेरा यही तरीका है।”

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids

राजा बोला, “तरीका तो समझ गया। मगर पहले दिन कितना लेंगे, यही असली बात है। दो-चार रुपयों से पेट भर जाए तो अच्छी बात है, मगर एकदम से बीस-पचास माँगने लगे, तब तो बीस दिन में काफ़ी बड़ी रकम हो जाएगी।”

संन्यासी ने हँसते हुए कहा, “महाराज, मैं लोभी नहीं हूँ। आज मुझे एक रुपया दीजिए, फिर बीस दिन तक दुगुने करके देते रहने का हुक्म दे दीजिए।”

यह सुनकर राजा, मंत्री और दरबारी सभी की जान में जान आई। राजा ने हुक्म दे दिया कि संन्यासी के कहे अनुसार बीस दिन तक राजकोष से उन्हें भिक्षा दी जाती रहे।

संन्यासी राजा की जय-जयकार करते हुए घर लौट गए।

राजा के आदेश के अनुसार राजभंडारी प्रतिदिन हिसाब करके संन्यासी को भिक्षा देने लगा। इस तरह दो दिन बीते, दस दिन बीते। 

दो सप्ताह तक भिक्षा देने के बाद भंडारी ने हिसाब करके देखा कि दान में काफ़ी धन निकला जा रहा है। यह देखकर उन्हें उलझन महसूस होने लगी। महाराज तो कभी किसी को इतना दान नहीं देते थे। उसने यह बात मंत्री को बताई।

मंत्री ने कुछ सोचते हुए कहा, “वाकई, यह बात तो पहले ध्यान में ही नहीं आई थी। मगर अब कोई उपाय भी नहीं है। महाराज का हुक्म बदला नहीं जा सकता।”

इसके बाद फिर कुछ दिन बीते। भंडारी फिर हड़बड़ाता हुआ मंत्री के पास पूरा हिसाब लेकर आ गया। हिसाब देखकर मंत्री का चेहरा फीका पड़ गया।

वह अपना पसीना पोंछकर, सिर खुजलाकर, दाढ़ी में हाथ फेरते हुए बोला, “यह क्या कह रहे हो! अभी से इतना धन चला गया है! तो फिर बीस दिनों के अंत में कितने रुपए होंगे? भंडारी बोला, “जी, पूरा हिसाब तो नहीं किया है।” मंत्री ने कहा, “तो तुरंत बैठकर, अभी पूरा हिसाब करो।”

भंडारी हिसाब करने बैठ गया। मंत्री महाशय अपने माथे पर बर्फ़ की पट्टी लगाकर तेज़ी से पंखा झलवाने लगे। कुछ ही देर में भंडारी ने पूरा हिसाब कर लिया। 

मंत्री ने पूछा, “कुल मिलाकर कितना हुआ?”

भंडारी ने हाथ जोड़कर कहा, “जी, दस लाख अड़तालीस हज़ार पाँच सौ पिचहत्तर रुपए।”

मंत्री गुस्से में बोला, “मज़ाक कर रहे हो?” यदि संन्यासी को इतने रुपए दे दिए तब तो राजकोष खाली हो जाएगा।”

भंडारी ने कहा, “मज़ाक क्यों करूँगा? आप ही हिसाब देख लीजिए।” 

यह कहकर उसने हिसाब का कागज़ मंत्री जी को दे दिया। हिसाब देखकर मंत्री जी को चक्कर आ गया। सभी उन्हें सँभालकर बड़ी मुश्किलों से राजा के पास ले गए। 

राजा ने पूछा, “क्या बात है?”

मंत्री बोले, “महाराज, राजकोष खाली होने जा रहा है।”

राजा ने पूछा, “वह कैसे?”

मंत्री बोले, “महाराज, संन्यासी को आपने भिक्षा देने का हुक्म दिया है। मगर अब पता चला है कि उन्होंने इस तरह राजकोष से करीब दस लाख रुपए झटकने का उपाय कर लिया है।”

राजा ने गुस्से से कहा, “मैंने इतने रुपए देने का आदेश तो नहीं दिया था। फिर इतने रुपए क्यों दिए जा रहे हैं? भंडारी को बुलाओ।” 

मंत्री ने कहा, “जी सब कुछ आपके हुक्म के अनुसार ही हुआ है। आप खुद ही दान का हिसाब देख लीजिए।”

राजा ने उसे एक बार देखा, दो बार देखा, इसके बाद वह बेहोश हो गया। काफ़ी कोशिशों के बाद उनके होश में आ जाने पर लोग संन्यासी को बुलाने दौड़े।

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
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संन्यासी के आते ही राजा रोते हए उनके पैरों पर गिर पड़ा। बोला, “दुहाई है संन्यासी महाराज, मुझे इस तरह जान-माल से मत मारिए। जैसे भी हो एक समझौता करके मुझे वचन से मुक्त कर दीजिए। अगर आपको बीस दिन तक भिक्षा दी गई तो राजकोष खाली हो जाएगा। फिर राज-काज कैसे चलेगा!”

संन्यासी ने गंभीर होकर कहा, “इस राज्य में लोग अकाल से मर रहे हैं। मुझे उनके लिए केवल पचास हज़ार रुपए चाहिए। वह रुपया मिलते ही मैं समदूँगा मुझे मेरी पूरी भिक्षा मिल गई है।”

राजा ने कहा, “परंतु उस दिन एक आदमी ने मुझसे कहा था कि लोगों के लिए दस हज़ार रुपए ही बहुत होंगे।”

संन्यासी ने कहा, “मगर आज मैं कहता हूँ कि पचास हज़ार से एक पैसा कम नहीं लूंगा।”

दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids
दान का हिसाब - Moral Hindi Story For Kids

राजा गिड़गिड़ाया, मंत्री गिड़गिड़ाए, सभी गिड़गिड़ाए। मगर संन्यासी अपने वचन पर डटा रहा। आखिरकार लाचार होकर राजकोष से पचास हज़ार रुपए संन्यासी को देने के बाद ही राजा की जान बची।

पूरे देश में खबर फैल गई कि अकाल के कारण राजकोष से पचास हजार रुपए राहत में दिए गए हैं। सभी ने कहा, “हमारे महाराज कर्ण जैसे ही दानी हैं।”

आशा करता हूँ कि आप लोगों को यह कहानी (दान का हिसाब – Moral Hindi Story For Kids) अच्छी लगी होगी । 


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-धन्यवाद 

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