Discipline – Moral Story – Knowledge Story – #1

Discipline - Moral Story - Knowledge Story - Child Story
Discipline - Moral Story - Knowledge Story - Child Story

आज मैं आपलोगों को एक छोटे से कहानी के माध्यम से कुछ बताना चाहता हूँ। आशा करता हूँ कि आपलोगों को अच्छा लगेगा। (Discipline – Moral Story – Knowledge Story – Child Story)

हमारे पड़ोस में दो छात्र रहते हैं- एक का नाम प्रदीप है और दूसरे का नाम भुवन है। प्रदीप जब भी मेरे पास आता है तो सबसे पहले हाथ जोड़कर नमस्कार करता है। फिर चाचाजी बोलकर मुझसे बात शुरू करता है। बड़े ही मृदुल और शांत स्वभाव का है और प्रदीप का स्वर भी बहुत मधुर है। वहीं दूसरी ओर भुवन इसके बहुत ही विपरीत है। भुवन जब भी आता है तो वह दूर से ही चिल्लाते हुए आता है और बोलता है, “मुन्ना के पिताजी, आपको मेरे पिताजी बुला रहे हैं।”

हमारे आस पास के सभी लोग प्रदीप की बहुत प्रशंसा करते हैं। वे इसकी प्रशंसा करते कभी नही थकते और दूसरी ओर भुवन के व्यवहार पर सबको हंसी आ जाती है। जबकि भुवन पढ़ने-लिखने में प्रदीप से बहुत आगे है और भुवन का स्वास्थ्य भी प्रदीप से बहुत अच्छा है। फिर भी सभी लोग प्रदीप की ही प्रशंसा करते हैं। इसका एक मात्र कारण यह है कि प्रदीप का बोलचाल और व्यवहार भुवन से कई गुणा अच्छा है जो सबके मन को मोह लेता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि प्रदीप का व्यवहार शिष्ट है जबकि भुवन का अशिष्ट। 

हमें हमारे समाज में सभ्य बनकर रहने के लिए यह जरूरी है कि हमें शिष्टाचार के नियम अवश्य जानने चाहिए और इसे हमें अपनी आदतों में शामिल भी करनी चाहिए। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अलग-अलग समाजों में अलग-अलग शिष्टाचार के नियम होते हैं, परंतु सभी का आधार लगभग बराबर होता है।

शिष्टाचार में सबसे पहली चीज है विनम्रता। हमारी वाणी में, व्यवहार में विनम्रता पूरी तरह से घुली होनी चाहिये। इसलिए जब कोई हमसे बड़े हमें बुलाते हैं तो, “हाँ”, “अच्छा”, “क्या”, नहीं करना चाहिए। इसके बदले हमें “जी हाँ” या “जी नहीं” कहना चाहिए। किसी भी बात का उत्तर ऐसे नही देना चाहिए कि किसी को लगे कि उसे लाठी मारा जा रहा हो।

विनम्रता सिर्फ बड़ों के प्रति है नहीं होनी चाहिए, अपने अपने बराबर और अपनों से छोटों के प्रति भी विनम्रता और स्नेह का भाव होना चाहिए। सभी के साथ बात करने के समय हमारे वाणी में मिठास होनी चाहिए ना कि कटुता या कर्कशता होनी चाहिए।

विनम्रता सिर्फ भाषा की वस्तु नही है। हमारे कर्म में भी विनम्रता होनी चाहिए। जब कोई हमारे घर आते हैं तो हमें उनका प्रशंसा से स्वागत करनी चाहिए और यथोचित सत्कार करना चाहिए। हमें अपनों से बड़े और सम्मानित व्यक्तियों के बैठने के बाद ही बैठना चाहिए। महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार में और भी विनम्रता होनी आवश्यक है। जब हम बस या रेल में सफर करते हैं तो किसी महिला या दिव्यांग व्यक्ति को खड़ा हुआ देखकर अपनी जगह उन्हें बैठने के लिए दे देनी चाहिए। यह भी एक शिष्ट आचरण है।

Discipline – Moral Story – Knowledge Story – Child Story

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आपको पता होना चाहिए कि विनम्रता और दीनता में बहुत अंतर होता है। विनम्रता होते हुए भी हम अपने स्वाभिमान की रक्षा कर सकते हैं। विनम्र व्यवहार का मतलब चापलूसी नहीं होता। यदि कभी भी हमें यह महसूस हो कि जिसके प्रति हम विनीत हैं और वह हमारा तिरस्कार कर रहा है अथवा हमें दीन-हीन जानकर हमारे प्रति दया की भावना प्रकट कर रहा है तो हमें उसकी कृपा प्राप्त करने की कोशिस नही करनी चाहिए।

शिष्टाचार का दूसरा विशेष गुण यह है कि दूसरों के निजी बातों में दखल नहीं देना चाहिए। हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक निजी जीवन होता है। इसलिए हमें बिना कारण किसी से उसका वेतन, उम्र या जाति नहीं पूछना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति कुछ लिख रहा हो तो हमें झाँक-झाँककर उसे पढ़ने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। जब हम किसी के घर या दफ्तर जाते हैं तो उससे बिना पूछे कुछ हाथ नही लगाना चाहिए। अगर हम बिना पूछे ऐसा करते हैं तो यह अशिष्टता कहलाती है।

जब हमारे लिए कोई कष्ट उठाकर कोई काम करता है तो हमें उसके प्रति अपनी कृतज्ञता अवश्य प्रकट करनी चाहिए। इसका सबसे सरल उपाय यह है कि हमें उस व्यक्ति को धन्यवाद देना चाहिए। इसी तरह अगर कोई सफर करते समय हमें बैठने के लिए जगह दे तो हमें उसे धन्यवाद करना चाहिए। उसे धन्यवाद शब्द बोलते समय ऐसा लगने चाहिए कि हम उसे हृदय से धन्यवाद दे रहे हैं, केवल ऊपर ही ऊपर नहीं।

जब हम भोजन करने बैठते हैं तो हमें कुछ बातों का ध्यान देना चाहिए। हमें खाने में अधीरता नहीं दिखानी चाहिए। खाना चबाते समय मुँह से आवाज़ नहीं निकालनी चाहिए। यह अच्छा नहीं माना जाता है। अपनों से बड़ो के भोजन समाप्त होने पर भी खाते रहना उचित नहीं है। 

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शिष्टता का तीसरा आधार अनुशासन का पालन है। अनुशासन समाज के नैतिक नियमों का भी हो सकता है और कानून की धाराओं के भी। जैसे कि अगर हम किसी धर्म स्थान पर जाते हैं तो हमें जुता या चप्पल बाहर ही उतार कर रखना चाहिए। ये धार्मिक अनुशासन का पालन है। सड़क पर बाईं ओर चलना, जहां जाना मना है वहां नहीं जाना कानून के अनुशासन का पालन करना है। समय का पालन करना सामाजिक नियमों का पालन है। ठीक समय पर कहीं पहुँचना अनुशासन भी सिखाता है और लाभ भी पहुँचाता है।

हमें सभी तरह के अनुशासन (Discipline) का सामान्य ज्ञान होना आवश्यक है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शिष्टाचार वह व्यवहार है जिसके दूसरों के तथा अपने मन को प्रसन्नता होती है। इसके विपरीत अशिष्टता व्यवहार से दूसरों का दिल दुखता है और इससे अंत में हमें भी हानि होती है।

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-धन्यवाद 

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3 Comments

  1. Reminded the old story.

  2. Nice

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