Adhyay One – Chanakya Niti In Hindi 1

अध्याय : 1 चाणक्य नीति (Adhyay One- Chanakya Niti In Hindi)

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Adhyay One - Chanakya Niti In Hindi 1
Adhyay One - Chanakya Niti In Hindi 1

प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् । 
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ।।

भावार्थ – उपर्युक्त श्लोक के द्वारा आचार्य चाणक्य समझाते हैं कि अनेक असंख्यक शास्त्रों का अध्ययन रसपान करके लिखे जाने वाले राजनीति समुच्चय नीतिग्रन्थ रचना के आरम्भ में वे विष्णु भगवान जी को सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं।

व्याख्या – आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मैं स्वर्ग , मृत्यु, पाताल के कर्ता धर्ता भगवान विष्णु जी को नतमस्तक होकर वेदयुक्त अनेक महान ग्रन्थों से मोती चुनकर राजनीति समुच्चय नामक ग्रंथ का वर्णन करूंगा।

ईश्वर विशेष – प्रभु या ईश्वर सर्वशक्ति सम्पन्न का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रभु जो चाहे या जैसा चाहे वैसा करे, क्योंकि ईश्वर अपने आपको मृत कर दूसरा कोई ईश्वर निर्मित नहीं कर सकते, अपने आप मूर्ख या धूर्त नहीं हो सकते, वे पाप कर्म तो नहीं कर सकते।

जगत् में किसी को भी अपने राज्य से वंचित नहीं कर सकते, अपने आप भी अपने कंधे पर नहीं विराजमान हो सकते।

ईश्वर शब्द का रहस्य सिर्फ इतना ही है कि ईश्वर सृष्टि निर्मित करके उसके पालन-पोषण एवं प्रलय एवं जीवों के कर्म के अनुसार फल देने में किसी की भी मदद नहीं स्वीकार करते, परन्तु अपने अनन्त सामर्थ्य बल से ही अपने समस्त कार्य पूर्ण करते हैं।

विद्वान चाणक्य ने प्रभु प्रार्थना से ग्रंथ निर्मित करके इस बात को पूर्ण रूप से स्वीकृत कर लिया है कि इसे पूर्व के ग्रंथों के रसपान से करके लिख रहे हैं।

अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः।
धर्मोपदेशविख्यातं कार्याऽकार्यं शुभाऽशुभम् ।।

भावार्थ- श्रेष्ठतम पुरुष इस अमृतमयी शास्त्र का विधि के अनुसार अध्ययन रत होकर वेदयुक्त शास्त्रों में सम्मिलित कर्तव्य-अकर्त्तव्य, पाप-पुण्य,धर्म-अधर्म को सही-सही मूल्यांकन कर लेता है। 

व्याख्या – इस श्लोक का अध्ययन रस यह है कि बुद्धिजीवी पुरुष इस नीतिशास्त्र को पढ़कर यह ज्ञात कर लेता है कि कौन – सा कार्य उत्तम है या कौन सा कार्य करने योग्य नहीं है, उसे कार्य के सुखद और दुःखद फल के परिणाम के सम्बन्ध में समस्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

इसलिए वह अपने व्यवहार में कुशलता निर्मित कर सकता है। इन कार्यों के करने योग्य फल या न करने योग्य फल से धर्म उपदेशक भी माना जा सकता है।

मनुष्य के समस्त जीवन में धर्म के अनुसार उसका आचरण ही उसे अच्छे और बुरे फल कर्मों में अन्तर बता देता है तथा उसे सत्य कर्म को अभिप्रेरित करता है।

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया । 
येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ।।

भावार्थ – मैं मानवमात्र कल्याण की अभिलाषा से पुरुष के भले के लिए उस नीतिशास्त्र का सही – सही उपदेश करूंगा। जिसके ज्ञान अंकुर से मनुष्य सर्वज्ञता को पा लेता है। 

व्याख्या- उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य के अनुसार,”कि मैं मनुष्यों के हित में राजनीति के उन गूढ रहस्यों की व्याख्या करता हूं, जिसमें केवल ज्ञान से मनुष्य अपने भाव को महान् विभूति समझ सकता है।

महात्मा चाणक्य की यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि मनुष्य की राजनीति के अति सूक्ष्म रहस्य ज्ञान के प्रकाश में आ जाए तो वह इस प्रकाश से अपने महान होने के मार्ग का निर्माण कर सकता है।

महात्मा चाणक्य ने यहां राजनीतिक मूल्यवान सिद्धान्तों को अपनाने का वर्णन नहीं किया है।”

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ।। 

भावार्थ- मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से, दुष्ट चरित्र स्त्री का भरण – पोषण करने से और दुखियों के साथ अभद्र आचरण करने से बुद्धिमान मनुष्य को कष्ट उठाता है। 

व्याख्या- मूर्ख शिष्य को उपदेश देने, दुष्ट, क्रूर और कुलटा नारी का भरण – पोषण तथा दुखियों के संग रहने से, बुद्धिमान व्यक्तियों को भी अपार कष्ट हो सकते हैं। महात्मा चाणक्य ने पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है कि धूर्त शिष्य को अच्छी बात को करने हेतु अभिप्रेरित नहीं करना चाहिए। इस प्रकार दुष्ट व्यवहार वाली स्त्री का भी साथ उचित नहीं है और दीन – दुखियों के संग उठने – बैठने एवं समागम से ज्ञान से परिपूर्ण बुद्धिमान व्यक्ति को भी दुःख उठाना पड़ता है।

दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससपे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ।।

भावार्थ – इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कहा है कि कड़वेपन वाणी से प्रयोग करने वाली और दुराचारी पत्नी, स्त्री, मूर्ख मित्र तथा कहने को न मानने वाला, सामना करने वाला और जहां सांप निवास करता हो, ऐसे सर्प वाले गृह में वास करना निस्सन्देह मृत्यु रूप समान है। 

व्याख्या – उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य समझते हैं कि जिस व्यक्ति की स्त्री या पत्नी दुष्ट दुराचारिणी होती है, जिसके सखा या मित्र नीच स्वभाव रखते हों और नौकर – नौकरानी बात – बात में तुरन्त उत्तर देते हों, कहना बिल्कुल न मानते हों, और जिस गृह में सांप अपना वास कर ले। ऐसे गृह में वास करने वाला पुरुष निश्चित ही मृत्यु के बिल्कुल नजदीक रहता है। ऐसे मनुष्य की मृत्यु की समय सीमा निश्चित नहीं होती।

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि । 
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ।।

भावार्थ – उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य का कहना है कि बुरे वक्त हेतु धनसंग्रह करें और धन से अत्यधिक स्त्री की धर्म रक्षा करें और सदा ही स्त्री और धन से भी अत्यधिक स्वयं की रक्षा करनी चाहिए। 

व्याख्या – बुद्धि वाले व्यक्ति को सदैव चाहिए कि धनसंग्रह द्वारा अपने अपत्ति काल के समय की सुरक्षा करे तथा धन से अधिक पत्नी धर्म की रक्षा करे। इन दोनों से भी अधिक स्वयं की सुरक्षा करे , क्योंकि अपना नाश हो जाने से धन और स्त्री दोनों से क्या लाभ ? व्यक्ति को अपनी समस्त वस्तुओं की रक्षा करते करते जान गंवानी पड़े तो सबसे पहले अपनी रक्षा करनी चाहिए।

आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीयतां कुत आपदः ।
कदाचिच्चलिता लक्ष्मीः संचितोऽपि विनश्यति ।।

भावार्थ – आचार्य चाणक्य जी ने कहा है कि विपत्ति निवारणार्थ हेतु धन की सुरक्षा करनी चाहिए, धनवानों वैभवधारियों पर बुरा समय कब आता है, कभी दैविक आपदा से संपत्ति धन – वैभव बह जाता है, यदि बात ऐसी है तो धन – संग्रह भी नष्ट हो जाता है।

व्याख्या – समस्त प्रकृति के अनेक प्रणधारी इस बात के सबूत हैं कि दु : ख के समय को सुख में बदलने के लिए उपभोक्ता सदैव सामग्री का संचय करते रहते हैं।

ठीक उसी तरह जैसे चींटियां बरसात से पूर्व अपने बिल या गृह में अन्न का भण्डार कर लेती हैं, क्योंकि गृह के बाहर पानी में निकलकर अन्न को लाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

इस कारण भण्डार से ही बुरे वक्त में सुखपूर्वक उपभोग किया जा सके, परन्तु उन्हें यह ज्ञान नहीं होता, न जाने कब पानी की लहर आएगी और समस्त भण्डार को नष्ट कर देगी, इस साक्ष्य का मूल अर्थ यह भी नहीं है कि धन चल – संपत्ति होने के कारण मनुष्य कदापि उसका संग्रह ही न करे।

व्यक्ति को फिर भी सदैव धन को स्थिर रूप में रखने का प्रयास करना चाहिए।

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः । 
न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत् ।।

भावार्थ – जिस देश में मान – सम्मान, आजीविका, गुरु, माता – पिता, विद्या प्राप्ति के कोई भी साधन उपलब्ध नहीं हैं। उस देश के उस स्थान को तुरन्त त्याग देना हितकर है। 

व्याख्या- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। प्रत्येक मनुष्य इसी समाज में एक यथा सम्मान की इच्छा रखता है या वह जो कार्य करे , उसमें उसे मान – सम्मान प्राप्त हो।

यह तो बहुत ही सहज अनुभव की बात है, प्रत्येक व्यक्ति में ऐसी अभिलाषा समय – समय पर बलवती भी हो उठती है, यदि उसका देश मान सम्मान न देकर रोजगार न देकर या भाई, बन्धु न रहते हों तो वहां निवास कदापि उचित नहीं होगा।

धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः । 
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ।।

भावार्थ- आचार्य चाणक्य ने कहा है कि धनवान , वेदज्ञाता ब्राह्मण, धर्म और न्यायपालक राजन्, कृषि की सिंचाई के लिए नदी एवं पांचवां वैद्य, जिस देश की किसी भी स्थान में पांचों स्थापित न हों वहां पल भर भी नहीं रहना चाहिए। 

व्याख्या – जिस देश में धन – धान्य युक्त व्यापारी कर्मकांड में निपुण वेदज्ञाता पुरोहित ब्राह्मण, धर्म न्यायशासन व्यवस्था में गुणी राजा, सिंचाई हेतु जल की पूर्ति करने के लिए नदियां और रोग निवारण के लिए वैद्य या डॉक्टर निवास न करते हों या ये पांचों सुविधाएं विद्यमान न हों वहां व्यक्ति को एक दिन या पल भर भी नहीं टिकना चाहिए।

लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता । 
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संस्थितिम् ।।

भावार्थ – जहां पर जीविका का साधन, व्यवसाय, दण्ड भय, लोक लज्जा, चतुराई और दान देन की आदत – ये पांचों महत्त्वपूर्ण कारक विद्यमान न हों वहां वास नहीं करना चाहिए । 

व्याख्या – व्यक्ति को उस स्थान पर निवास करना चाहिए या उस जगह रहने की योजना को विस्तार देना चाहिए, जहां लोग लोक परलोक ईश्वर में ही विश्वास करते हों, जहां सामाजिक आदर सम्मान निहित हो, लोगों में नीच प्रकार का कार्य करने से संकोच और शर्म विद्यमान हो और समर्पण की भावना लीन हो। ऐसी जगह पर ही बुद्धिवासी व्यक्ति को वास करना चाहिए।

जहां ये पांचों तत्त्व संगठित न हों, वहां के लोगों का संग नहीं करना चाहिए।

जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे। 
मित्रं चाऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ।।

भावार्थ – कार्य में नियुक्ति करने पर नौकरों की, दुःख आने पर घरवालों की, विपत्ति काल में दोस्तों की और धन नष्ट होने पर पत्नी की अग्नि परीक्षा होती है। 

व्याख्या – आचार्य चाणक्य ने कहा है कि कार्य में लगा देने या कार्य निकल आने पर या नौकरों के जाने पर, नौकरों – चाकरों की परीक्षा हो जाती है।

विपत्ति के आ जाने पर बन्धु – बाधवों का इम्तिहान होता है और संकट के आने पर सच्चे मित्र का इम्तिहान हो जाता है तथा धन के चलायमान हो जाने पर या नाश हो जाने पर स्त्री की परीक्षा हो जाती है।

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रु – संकटे । 
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ।।

भावार्थ – सच्चे बन्धु – बान्धवों का सम्पूर्ण परिचय करते हुए कहा गया है कि व्यक्ति को अपने आचरण से ऐसे बन्धु – बान्धवों को संस्कार ऐसे देने चाहिए जो मरते हैं। दम तक संग रहें। कष्टप्रद समय में साथ देने वाले ही सच्चे अर्थों में जीवन साथी होते हैं।

व्याख्या – रोगी हो जाने पर अकस्मात विपत्ति पड़ जाने पर, दैविक आपदा पड़ने पर, शत्रु द्वारा संकट उपस्थित कर देने पर, राज्य की सभा में अथवा अदालत में और मृतक के संग श्मशान घाट में जो सहायक होता है, वही सच्चा जीवन बंधु हैं।

यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ।।

भावार्थ – जो व्यक्ति ध्रुव निश्चित पदार्थ या भोग को त्यागकर, परित्याग कर अनिश्चित वस्तु अथवा भोग्य पदार्थ के लिए भागता – फिरता है, उसकी प्राप्ति का यल करता है, उसके निश्चित पदार्थ भोग या कार्य समाप्त हो जाते हैं। बेरंग होकर बिगड़ जाते हैं और अनिश्चित पदार्थ, भोग, कार्य सभी तो समाप्त ही हैं।

व्याख्या – अनेक मनुष्य ऐसे होते हैं, जिन्हें स्वयं पर भरोसा होता है कि अमुक कार्य कर सकते हैं या उनके द्वारा किसी कार्य का होना असम्भव नहीं है, किन्तु वे ऐसे कार्य के पीछे दौड़ जाते हैं, जिनके सम्बन्ध में उन्हें किसी प्रकार का आभास भी नहीं होता।

उन्हें शंका होती है, सम्भवतः जो कार्य हम करना चाहते हैं, वह अपूर्ण हो या उनके वश से परे होता है, ऐसी परिस्थिति में ऐसे मनुष्य उस कार्य से पृथक् हो जाते हैं, जिनके सम्बन्ध में उन्हें पूर्ण हो जाने की आशा बंधी रहती है, जबकि वह कार्य तो समाप्त होता ही है, जो कि निश्चित नहीं होता और सामर्थ्य से परे भी होता है ।

वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् । 
रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ।। 

भावार्थ – उपर्युक्त श्लोक के अनुसार आचार्य चाणक्य ने वंश की श्रेष्ठता पर बल की प्रेरणा दी है, गृहस्थी से सम्बन्धित शादी – विवाह हेतुनारी का चयन वरन् सुन्दर नहीं बल्कि वंश की श्रेष्ठता को देखें। 

व्याख्या – बुद्धिवासी व्यक्ति को श्रेष्ठतम वंश की कन्या से विवाह कर लेना गृहस्थ आश्रम का मूल मंत्र है, परन्तु भले ही वह रूपवान न हो, लेकिन नीच वंश से जन्मी कन्या से विवाह जैसा मांगलिक कार्य कदापि न करें, क्योंकि बुद्धिमान पुरुष को समान व श्रेष्ठतम वंश में विवाह करना शोभा देता है।

नखीनां च नदीनां च शृङ्गीणां शस्त्रपाणिनाम् । 
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ।।

भावार्थ – आचार्य चाणक्य के उपर्युक्त श्लोक के माध्यम से शेर, व्याघ्रादि नाखून रखने वाले प्राणियों एवं नदियों एवं सींगधारी सांड़ पशु, हाथ में तलवार, परशु उठाए शस्त्रधारियों का, स्त्रियों पर और राजकुलों पर यकीन कदापि नहीं करना चाहिए। 

व्याख्या – मनुष्यों को लम्बे नाखूनधारियों वाले प्राणियों से सदैव सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे नाखूनधारी प्राणी मनुष्य की चोट से बचना चाहिए।

स्रोतों वाली नदियों के कभी पास नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इसकी गहराई का कुछ भी अनुमान नहीं होता।

शस्त्रधारी और सींगधारी पर मनुष्य को कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।

न जाने कब किस तरफ से प्रहार कर दें। इस प्रकार से स्त्री और राजवंशों के इतिहास में आचार्य चाणक्य बतलाते हैं कि स्त्री पर अंधविश्वास कदापि न करें, जितना जरूरत समझें , उतना ही विश्वास करें, उसे आजाद छोड़ने पर पथभ्रष्ट होने का भय सदैव बना रहता है।

राजकुलों के व्यक्तियों से प्रायः सावधान रहना चाहिए क्योंकि उनकी मति का कुछ भी विश्वास नहीं।

वह न जाने कब किस वक्त और कहां पर किस मकड़जाल में फंसा दें, उपर्युक्त सभी समस्त प्राणियों से सतर्क रहना आवश्यक है।

विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम् । 
नीचादप्युत्तमा विद्या स्त्रीरलं दुष्कुलादपि ।।

भावार्थ – उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य को जगत् रूपी गंदे स्रोत से कोई श्रेष्ठतम पदार्थ यदि मिलता है तो उसे लेने या प्राप्त करने में संकोच कदापि नहीं करना चाहिए। 

व्याख्या – उपर्युक्त श्लोक से आचार्य चाणक्य द्वारा कहा गया है कि विषय में से भी अमृत जूस ग्रहण करने या ले लेने के योग्य है।

अपवित्र, गंदे पदार्थ में से स्वर्ण निकाल लेने योग्य है, नीच व्यक्ति से श्रेष्ठतम विद्या का पान, कला – कौशलता गुण लेना चाहिए और दुष्टतम वंश से भी स्त्री जैसे रत्न को प्राप्त कर लेना चाहिए, यह बुद्धिमान व्यक्ति की निशानी है।

स्त्रीणां द्विगुण आहारो बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा । 
साहसं षड्गुणं चैव कामोऽष्टगुण उच्यते ।।

भावार्थ – इस श्लोक में आचार्य चाणक्य जी ने स्त्री – पुरुष के अन्तर का विभाजन किया है। 

व्याख्या – उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य यह कहना चाहते हैं कि स्त्रियां मनुष्य से भोजन की मात्रा दोगुना अधिक, शर्मोहया स्त्रियों में पुरुष की अपेक्षाकृत चार गुना अधिक सदैव होती है, यही कारण होता है कि व्यक्ति स्त्री के मन की थाह जानने में कभी समर्थवान् नहीं होता है।

वह व्यक्ति कितना भी अधिक प्रयास करे।

स्त्री कदापि खुलकर भी अपने मन की थाह कभी नहीं कहती। चाणक्य आगे बताते हैं कि स्त्रियों में साहस करने की अधिकता आदमियों के साहस के अपेक्षाकृत छह गुनी अधिक होता है और स्त्री में कामाग्नि पुरुषों की अपेक्षाकृत आठ गुना अधिक होती है।

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