कौन सुंदर | हिंदी कहानी

नमस्कार दोस्तों! आज मैं फिर से आपके सामने हिंदी कहानी “कौन सुंदर” लेकर आया हूँ. जलालुद्दीन रूमी कहते हैं, ‘रूप -सुंदर होते हुए भी यदि मनुष्य में दोष हैं तो उसका मान नहीं हो सकता.

तो शुरू करते हैं आज का पोस्ट जिसका नाम है- “कौन सुंदर”. अगर आपको कहानियां पढने में अच्छा लगता है तो मेरे ब्लॉग साईट पर आप पढ़ सकते हैं यहाँ आपको कई तरह की कहानियां देखने को मिलेगी. आप लिंक पर क्लिक करके वहाँ तक पहुँच सकते हैं. (यहाँ क्लिक करें)

कौन सुंदर -हिंदी कहानी
कौन सुंदर -हिंदी कहानी

कौन सुंदर – हिंदी कहानी

एक समय की बात हैं एक राजा ने दो दास खरीदे. जिसमें एक दास दिखने में सुंदर था और दुसरा दिखने में समान्य सा और गंदा था.

उसने सबसे पहले सुंदर दिखने वाले दास से बातचीत की. वह बड़ा बुद्धिमान और मीठा बोलने वाला मालूम हुआ. राजा जब इस दास की परीक्षा कर चुका तो उसने दूसरे दास को अपने पास बुलाया. उसने पाया कि वह दिखने में सामान्य और गंदा है. राजा को उसे देखकर खुशी नहीं हुई. वह उसकी परख करने लगा.

पहले वाले दास को उसने नहा-धोकर आने के लिए कह दिया और दूसरे से कहा- ‘तुम अपने बारे में कुछ – बताओ. तुमको देखकर उन बातों पर यकीन नहीं होता जो तुम्हारे साथी ने तुम्हारे लिए कही हैं. वह तो तुम्हारी बहुत कमी गिना रहा था.’

गदे गुलाम ने जवाब दिया, ‘मेरे बारे में उसने यदि कुछ कहा है तो सच ही कहा होगा. वह बड़ा सच्चा और भला है और वह गलत नहीं कहा होगा. मैं उसकी बुराई नहीं कर सकता. हो सकता है कि मुझे ही  खुद में गलती नहीं दिखती होंगी. आप चिंता न करें, मैं स्वयं में सुधार करने की पूरी कोशिश करूंगा.’

राजा ने उसे कई तरह से उकसाने की कोशिश की, पर उसने यही कहा कि मेरे साथी की अच्छाइयां बहुत अधिक हैं. अब तक पहले वाला दास जो नहाने गया था वापस आ गया. राजा ने दूसरे को विदा कर दिया.

सुंदर दास के गुणों की तारीफ करते हुए राजा ने कहा, ‘पता नहीं, तुम्हारे साथी को अचानक क्या हो गया था कि उसने पीठ-पीछे तुम्हारी खूब बुराई की.’

सुंदर दास ने चिढ़कर कहा ‘राजाजी, उसने जो कुछ भी मेरे बारे में  कहा, जरा मुझे भी  बतलाइये.’

राजा ने कहा, ‘उसने  बोला की तुम दोगले हो. दवा नहीं, दर्द हो.’

बस इतना सुनते ही सुंदर दास का पारा चढ़ गया और चेहरा तमतमाने लगा और वह अनापशनाब बकने लगा. वह समान्य से दिखने वाले गंदे दास की बुराई करता रहा.

अब राजा ने कहा, ‘बस करो दास, अब तो हद हो गयी. वह दास तो सिर्फ गंदा रहता है, तुम्हारा तो स्वभाव ही गंदा है.’

Conclusion:

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