आदर्श प्रेम | आत्मदीप | लहर सागर का श्रृंगार नहीं | हरिवंशराय बच्चन | हिंदी कविता | PDF

नमस्कार दोस्तों! आज मैं फिर से आपके सामने तीन हिंदी कवितायें (Hindi Poems) “आदर्श प्रेम”, “आत्मदीप” और “लहर सागर का श्रृंगार नहीं” लेकर आया हूँ और इन तीनो कविताओं को हरिवंशराय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) जी ने लिखा है. 

आशा करता हूँ कि आपलोगों को यह कविता पसंद आएगी. अगर आपको और हिंदी कवितायेँ पढने का मन है तो आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं (यहाँ क्लिक करें).

आदर्श प्रेम | आत्मदीप | लहर सागर का श्रृंगार नहीं | हरिवंशराय बच्चन | हिंदी कविता | PDF
आदर्श प्रेम | आत्मदीप | लहर सागर का श्रृंगार नहीं | हरिवंशराय बच्चन | हिंदी कविता | PDF

आदर्श प्रेम – आत्मदीप – लहर सागर का श्रृंगार नहीं – हरिवंशराय बच्चन – हिंदी कविता

आदर्श प्रेम – हरिवंशराय बच्चन – हिंदी कविता

(Click Here to download PDF format)

प्यार किसी को करना लेकिन
कह कर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या

गुण का ग्राहक बनना लेकिन
गा कर उसे सुनाना क्या
मन के कल्पित भावों से
औरों को भ्रम में लाना क्या

ले लेना सुगंध सुमनों की
तोड उन्हे मुरझाना क्या
प्रेम हार पहनाना लेकिन
प्रेम पाश फैलाना क्या

त्याग अंक में पले प्रेम शिशु
उनमें स्वार्थ बताना क्या
दे कर हृदय हृदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या

आत्मदीप – हरिवंशराय बच्चन – हिंदी कविता

(Click Here to download PDF format)

मुझे न अपने से कुछ प्यार,
मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक,
ज्योति चाहती, दुनिया जब तक,
मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार.

पर यदि मेरी लौ के द्वार,
दुनिया की आँखों को निद्रित,
चकाचौध करते हों छिद्रित
मुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार.

केवल इतना ले वह जान
मिट्टी के दीपों के अंतर
मुझमें दिया प्रकृति ने है कर
मैं सजीव दीपक हूँ मुझ में भरा हुआ है मान.

पहले कर ले खूब विचार
तब वह मुझ पर हाथ बढ़ाए
कहीं न पीछे से पछताए
बुझा मुझे फिर जला सकेगी नहीं दूसरी बार.

लहर सागर का श्रृंगार नहीं – हरिवंशराय बच्चन – हिंदी कविता

(Click Here to download PDF format)

लहर सागर का नहीं श्रृंगार,
उसकी विकलता है;
अनिल अम्बर का नहीं खिलवार
उसकी विकलता है;
विविध रूपों में हुआ साकार,
रंगो में सुरंजित,
मृत्तिका का यह नहीं संसार,
उसकी विकलता है.

गन्ध कलिका का नहीं उदगार,
उसकी विकलता है;
फूल मधुवन का नहीं गलहार,
उसकी विकलता है;
कोकिला का कौन सा व्यवहार,
ऋतुपति को न भाया?
कूक कोयल की नहीं मनुहार,
उसकी विकलता है.

गान गायक का नहीं व्यापार,
उसकी विकलता है;
राग वीणा की नहीं झंकार,
उसकी विकलता है;
भावनाओं का मधुर आधार
सांसो से विनिर्मित,
गीत कवि-उर का नहीं उपहार,
उसकी विकलता है.

Conclusion

तो उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारा यह हिंदी कविता “आदर्श प्रेम”, “आत्मदीप” और “लहर सागर का श्रृंगार नहीं” अच्छा लगा होगा जिसे हरिवंशराय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) जी ने लिखा है. आप इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हमें आप Facebook Page, Linkedin, Instagram, और Twitter पर follow कर सकते हैं जहाँ से आपको नए पोस्ट के बारे में पता सबसे पहले चलेगा. हमारे साथ बने रहने के लिए आपका धन्यावाद. जय हिन्द.

Image Source

Pixabay: [1]

इसे भी पढ़ें

Leave a Reply

%d bloggers like this: