बादल | सुमित्रानंदन पंत | हिन्दी कविता

नमस्कार दोस्तों! आज मैं फिर से आपके सामने हिंदी कविता (Hindi Poem) बादल लेकर आया हूँ और इस कविता को सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) जी ने लिखा है.

आशा करता हूँ कि आपलोगों को यह कविता पसंद आएगी. अगर आपको और हिंदी कवितायेँ पढने का मन है तो आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं (यहाँ क्लिक करें).

बादल | सुमित्रानंदन पंत | हिन्दी कविता
बादल | सुमित्रानंदन पंत | हिन्दी कविता

बादल – सुमित्रानंदन पंत – हिन्दी कविता

सुरपति के हम हैं अनुचर,
जगत्प्राण के भी सहचर;
मेघदूत की सजल कल्पना,
चातक के चिर जीवनधर;

मुग्ध शिखी के नृत्य मनोहर,
सुभग स्वाति के मुक्ताकर;
विहग वर्ग के गर्भ विधायक,
कृषक बालिका के जलधर !

जलाशयों में कमल दलों-सा
हमें खिलाता नित दिनकर,
पर बालक-सा वायु सकल दल
बिखरा देता चुन सत्वर;

लधु लहरों के चल पलनों में
हमें झुलाता जब सागर,
वहीं चील-सा झपट, बाँह गह,
हमको ले जाता ऊपर.

भूमि गर्भ में छिप विहंग-से,
फैला कोमल, रोमिल पंख ,
हम असंख्य अस्फुट बीजों में,
सेते साँस, छुडा जड़ पंक !

विपुल कल्पना से त्रिभुवन की
विविध रूप धर भर नभ अंक,
हम फिर क्रीड़ा कौतुक करते,
छा अनंत उर में निःशंक !

कभी चौकड़ी भरते मृग-से
भू पर चरण नहीं धरते ,
मत्त मतगंज कभी झूमते,
सजग शशक नभ को चरते;

कभी कीश-से अनिल डाल में
नीरवता से मुँह भरते ,
बृहत गृद्ध-से विहग छदों को ,
बिखरते नभ,में तरते !

कभी अचानक भूतों का सा
प्रकटा विकट महा आकार
कड़क,कड़क जब हंसते हम सब ,
थर्रा उठता है संसार ;

फिर परियों के बच्चों से हम
सुभग सीप के पंख पसार,
समुद तैरते शुचि ज्योत्स्ना में,
पकड़ इंदु के कर सुकुमार !

अनिल विलोड़ित गगन सिंधु में
प्रलय बाढ़ से चारो ओर
उमड़-उमड़ हम लहराते हैं
बरसा उपल, तिमिर घनघोर;

बात बात में, तूल तोम सा
व्योम विटप से झटक ,झकोर
हमें उड़ा ले जाता जब द्रुत
दल बल युत घुस वातुल चोर !

बुदबुद द्युति तारक दल तरलित
तम के यमुना जल में श्याम
हम विशाल जंबाल जाल-से
बहते हैं अमूल, अविराम;

दमयंती-सी कुमुद कला के
रजत करों में फिर अभिराम
स्वर्ण हंस-से हम मृदु ध्वनि कर,
कहते प्रिय संदेश ललाम !

दुहरा विद्युतदाम चढ़ा द्रुत,
इंद्रधनुष की कर टंकार;
विकट पटह-से निर्घोषित हो,
बरसा विशिखों-सा आसार;

चूर्ण-चूर्ण कर वज्रायुध से
भूधर को अति भीमाकार
मदोन्मत्त वासव सेना-से
करते हम नित वायु विहार !

स्वर्ण भृंग तारावलि वेष्टित,
गुंजित, पुंजित, तरल, रसाल,
मघुगृह-से हम गगन पटल में,
लटके रहते विपुल विशाल !

जालिक-सा आ अनिल, हमारा
नील सलिल में फैला जाल,
उन्हें फंसा लेता फिर सहसा
मीनों के-से चंचल बाल !

संध्या का मादक पराग पी,
झूम मलिन्दों-से अभिराम,
नभ के नील कमल में निर्भय
करते हम विमुग्ध विश्राम;

फिर बाड़व-से सांध्य सिन्धु में
सुलग, सोख उसको अविराम,
बिखरा देते तारावलि-से
नभ में उसके रत्न निकाम !

धीरे-धीरे संशय-से उठ,
बढ़ अपयश-से शीघ्र अछोर,
नभ के उर में उमड़ मोह-से
फैल लालसा-से निशि भोर;

इंद्रचाप-सी व्योम भृकुटि पर
लटक मौन चिंता-से घोर
घोष भरे विप्लव भय-से हम
छा जाते द्रुत चारों ओर !

व्योम विपिन में वसंत सा
खिलता नव पल्लवित प्रभात ,
बरते हम तब अनिल स्रोत में
गिर तमाल तम के से पात ;

उदयाचल से बाल हंस फिर
उड़ता अंबर में अवदात
फ़ैल स्वर्ण पंखों से हम भी,
करते द्रुत मारुत से बात !

पर्वत से लघु धूलि.धूलि से
पर्वत बन ,पल में साकार-
काल चक्र से चढ़ते गिरते,
पल में जलधर,फिर जलधार;

कभी हवा में महल बनाकर,
सेतु बाँधकर कभी अपार ,
हम विलीन हों जाते सहसा
विभव भूति ही से निस्सार !

हम सागर के धवल हास हैं
जल के धूम ,गगन की धूल ,
अनिल फेन उषा के पल्लव ,
वारि वसन,वसुधा के मूल ;

नभ में अवनि,अवनि में अंबर ,
सलिल भस्म,मारुत के फूल,
हम हीं जल में थल,थल में जल,
दिन के तम ,पावक के तूल !

व्योम बेलि,ताराओं में गति ,
चलते अचल, गगन के गान,
हम अपलक तारों की तंद्रा,
ज्योत्सना के हिम,शशि के यान;

पवन धेनु,रवि के पांशुल श्रम ,
सलिल अनल के विरल वितान !
व्योम पलक,जल खग ,बहते थल,
अंबुधि की कल्पना महान !

धूम-धुआँरे ,काजल कारे ,
हम हीं बिकरारे बादल ,
मदन राज के बीर बहादुर ,
पावस के उड़ते फणिधर !

चमक झमकमय मंत्र वशीकर
छहर घहरमय विष सीकर,
स्वर्ग सेतु-से इंद्रधनुषधर ,
कामरूप घनश्याम अमर !

Conclusion

तो उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारा यह हिंदी कविता जीवन यान अच्छा लगा होगा जिसे सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) जी ने लिखा है. आप इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हमें आप Facebook Page, Linkedin, Instagram, और Twitter पर follow कर सकते हैं जहाँ से आपको नए पोस्ट के बारे में पता सबसे पहले चलेगा. हमारे साथ बने रहने के लिए आपका धन्यावाद. जय हिन्द.

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Pixabay: [1]

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