10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

नमस्कार दोस्तों! जैसा कि आप जानते हैं सुभद्रा कुमारी चौहान जी का परिचय देना आसान बात नहीं है क्योंकि इनका नाम ही उनका परिचय बन जाता है. इन्हें कौन नहीं जानता ये अपने हिंदी रचनाओं के क्षेत्र में सबसे आगे भी और सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें आज भी सबके जुबान पर रहती हैं. तो आज मन आपके सामने लेकर आया हूँ 10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें जो बहुत प्रचलित हैं और सबसे उम्दा भी है.

तो चलिए शुरू करते हैं आप का पोस्ट “10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में” और अगर आपको और हिंदी कवितायेँ पढने का मन है तो आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं (यहाँ क्लिक करें).

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10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

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झांसी की रानी – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी.

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी.

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़.

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई थी झांसी में.

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई.

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया.

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया.

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात.

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

रानी रोईं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’.

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान.

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम.

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में.

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजई रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार.

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी.

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार.

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी.

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

जलियाँवाला बाग में बसंत – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते.

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे.

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है.

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना.

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना.

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें.

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले.

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना.

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर.

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं.

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना.

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर.

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना.

साध – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

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10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

मृदुल कल्पना के चल पँखों पर हम तुम दोनों आसीन.
भूल जगत के कोलाहल को रच लें अपनी सृष्टि नवीन.

वितत विजन के शांत प्रांत में कल्लोलिनी नदी के तीर.
बनी हुई हो वहीं कहीं पर हम दोनों की पर्ण-कुटीर.

कुछ रूखा, सूखा खाकर ही पीतें हों सरिता का जल.
पर न कुटिल आक्षेप जगत के करने आवें हमें विकल.

सरल काव्य-सा सुंदर जीवन हम सानंद बिताते हों.
तरु-दल की शीतल छाया में चल समीर-सा गाते हों.

सरिता के नीरव प्रवाह-सा बढ़ता हो अपना जीवन.
हो उसकी प्रत्येक लहर में अपना एक निरालापन.

रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली.
दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली.

तुम कविता के प्राण बनो मैं उन प्राणों की आकुल तान.
निर्जन वन को मुखरित कर दे प्रिय! अपना सम्मोहन गान.

मेरा नया बचपन – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी.
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी.

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद.
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी.

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया.
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया.

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे.
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे.

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया.
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया.

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे.
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे.

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई.
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई.

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी.
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी.

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी.
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी.

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने.
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने.

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं.
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं.

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है.
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है.

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना.
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना.

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति.
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति.

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप.
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी.
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी.

‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी.
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लाई थी.

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा.
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा.

मैंने पूछा ‘यह क्या लाई?’ बोल उठी वह ‘माँ, काओ’.
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा – ‘तुम्हीं खाओ’.

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया.
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया.

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ.
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ.

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया.
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया.

यह कदंब का पेड़ – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

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10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे.
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे.

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली.
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली.

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता.
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता.

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता.
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता.

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता.
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता.

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे.
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे.

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता.
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता.

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती.
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं.

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे.
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे.

कोयल – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

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देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
इसने ही तो कूक कूक कर
आमों में मिश्री घोली

कोयल कोयल सच बतलाना
क्या संदेसा लाई हो
बहुत दिनों के बाद आज फिर
इस डाली पर आई हो

क्या गाती हो किसे बुलाती
बतला दो कोयल रानी
प्यासी धरती देख मांगती
हो क्या मेघों से पानी?

कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पाई है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलाई है?

डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
सबसे मीठे मीठे बोलो
यह भी तुम्हें बताया है

बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी

वीरों का कैसा हो वसंत – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत

गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत

कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत

हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

झिलमिल तारे – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में

कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं
झिलमिल-झिलमिल तारे?
धीमे प्रकाश में कैसे तुम
चमक रहे मन मारे.

अपलक आँखों से कह दो
किस ओर निहारा करते?
किस प्रेयसि पर तुम अपनी
मुक्तावलि वारा करते?

करते हो अमिट प्रतीक्षा,
तुम कभी न विचलित होते.
नीरव रजनी अंचल में
तुम कभी न छिप कर सोते.

जब निशा प्रिया से मिलने,
दिनकर निवेश में जाते.
नभ के सूने आँगन में
तुम धीरे-धीरे आते.

विधुरा से कह दो मन की,
लज्जा की जाली खोलो.
क्या तुम भी विरह विकल हो,
हे तारे कुछ तो बोलो.

मैं भी वियोगिनी मुझसे
फिर कैसी लज्जा प्यारे?
कह दो अपनी बीती को
हे झिलमिल-झिलमिल तारे!

मेरा जीवन – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
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मैंने हँसना सीखा है
मैं नहीं जानती रोना;
बरसा करता पल-पल पर
मेरे जीवन में सोना.

मैं अब तक जान न पाई
कैसी होती है पीडा;
हँस-हँस जीवन में
कैसे करती है चिंता क्रिडा.

जग है असार सुनती हूँ,
मुझको सुख-सार दिखाता;
मेरी आँखों के आगे
सुख का सागर लहराता.

उत्साह, उमंग निरंतर
रहते मेरे जीवन में,
उल्लास विजय का हँसता
मेरे मतवाले मन में.

आशा आलोकित करती
मेरे जीवन को प्रतिक्षण
हैं स्वर्ण-सूत्र से वलयित
मेरी असफलता के घन.

सुख-भरे सुनले बादल
रहते हैं मुझको घेरे;
विश्वास, प्रेम, साहस हैं
जीवन के साथी मेरे.

मुरझाया फूल – सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें

10 बेहतरीन सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायें हिंदी में
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यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत.
स्वयं बिखरने वाली इसकी
पंखड़ियाँ बिखराना मत.

गुजरो अगर पास से इसके
इसे चोट पहुँचाना मत.
जीवन की अंतिम घड़ियों में
देखो, इसे रुलाना मत.

अगर हो सके तो ठंडी
बूँदें टपका देना प्यारे!
जल न जाए संतप्त-हृदय
शीतलता ला देना प्यारे!!

Conclusion

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Image Source: mycoaching.in

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